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  • अधिवेशन में आने का न्यौता
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हमारी राज-सेवा—2015
km 7/15 पेज 3

अधिवेशन में आने का न्यौता

1. अधिवेशन का न्यौता देने के लिए अभियान कब से शुरू होगा?

1 अगर आप अपने दोस्तों या परिवारवालों को एक खास दावत देना चाहते हैं जिसमें काफी मेहनत लगेगी और खर्चा होगा, तो बेशक, आप बड़े जोश के साथ उन्हें न्यौता देंगे। ठीक उसी तरह, आनेवाले हमारे अधिवेशन में हमें यहोवा की तरफ से जो दावत दी जाएगी उसे तैयार करने में भी काफी मेहनत की गयी है। यहोवा ने हमें यह सम्मान दिया है कि हम अधिवेशन के तीन हफ्ते पहले से दूसरों को इसमें हाज़िर होने का न्यौता दें। जोश के साथ दूसरों को न्यौता देने में क्या बात हमारी मदद करेगी?

2. अभियान में पूरा-पूरा हिस्सा लेने के लिए क्या बात हमें उभारेगी?

2 अधिवेशन में यहोवा हमें जो हिदायतें देता है, उससे हमें निजी तौर पर काफी फायदा होता है। अगर हम इस बात पर मनन करें, तो यह हमें उभारेगी कि हम इस अभियान में पूरा-पूरा हिस्सा लें। (यशा. 65:13, 14) हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हर साल चलाए जानेवाले इस अभियान के काफी अच्छे नतीजे निकलते हैं। (“इससे अच्छे नतीजे मिलते हैं” नाम का बक्स देखिए।) हम जिन्हें न्यौता देते हैं, उनमें से कुछ लोग अधिवेशन में हाज़िर होंगे और कुछ नहीं। भले ही कुछ लोग अधिवेशन में न आएँ, लेकिन अभियान में हिस्सा लेने के लिए हम जो मेहनत करते हैं, उससे यहोवा की महिमा होती है और यह ज़ाहिर होता है कि वह कितना दरियादिल है।—भज. 145:3, 7; प्रका. 22:17.

3. न्यौते कैसे दिए जाएँगे?

3 प्राचीनों के निकाय को तय करना चाहिए कि मंडली ज़्यादा-से-ज़्यादा न्यौते कैसे दे सकती है। उन्हें यह भी तय करना चाहिए कि जिन घरों में लोग नहीं मिलते, वहाँ न्यौता छोड़ा जाना चाहिए या नहीं और मंडली के इलाके में सरेआम गवाही देते वक्‍त न्यौते दिए जाने चाहिए या नहीं। जब मुनासिब हो, तो शनिवार-रविवार को न्यौते के साथ पत्रिकाएँ भी दी जा सकती हैं। अभियान खत्म होने के बाद हमें कितनी खुशी होगी कि हमने इसमें बड़े जोश से हिस्सा लिया और ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को न्यौता दिया, ताकि वे हमारे साथ यहोवा की तरफ से दी दावत का मज़ा ले सकें!

आप क्या कहेंगे?

दस्तूर के मुताबिक दुआ-सलाम करने के बाद, आप कह सकते हैं, “हम दुनिया-भर में चलाए जा रहे एक अभियान में हिस्सा ले रहे हैं, और लोगों को एक खास कार्यक्रम में हाज़िर होने का न्यौता दे रहे हैं। कार्यक्रम की तारीख, समय और पता परचे में दिया गया है।”

इससे अच्छे नतीजे मिलते हैं

  • कुछ साल पहले जब एक बहन न्यौता देने के अभियान में हिस्सा ले रही थी, तो उसके मन में यह खयाल आया कि क्या हमारी मेहनत रंग लाएगी। उसने सोचा, ‘क्या लोग सच में हमारा न्यौता कबूल करेंगे और अधिवेशन में आएँगे?’ शनिवार की सुबह अधिवेशन में उसने देखा कि सिख धर्म को माननेवाला एक व्यक्‍ति उसके पास बैठा है। बहन ने उसे अपना परिचय दिया। उससे बातचीत करने पर बहन को पता चला कि वह अधिवेशन में इसलिए आया है, क्योंकि उसे वहाँ आने का न्यौता मिला था। उसके मन में कई सवाल थे और बहन ने उसके सभी सवालों के जवाब दिए। उसने बहन को बताया कि उसे कार्यक्रम बहुत अच्छा लग रहा है और उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि लोगों ने सलीकेदार कपड़े पहने हैं और सभी एक-दूसरे से कितने अच्छे से पेश आ रहे हैं। उसी दिन कुछ समय बाद बहन की बातचीत एक पति-पत्नी से हुई, जो उसके पास बैठे थे। उन्हें भी अधिवेशन में आने का न्यौता मिला था और वे बस का सफर तय करके वहाँ आए थे। उन्हें कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा और उन्होंने तय किया कि वे रविवार के कार्यक्रम में भी आएँगे। इन सबसे मिलने के बाद बहन को एहसास हुआ कि हर साल चलाया जानेवाला हमारा अभियान कितना ज़रूरी है।

  • हाल ही में हुए एक अधिवेशन में पायनियर सेवा कर रहे एक पति-पत्नी की मुलाकात एक बुज़ुर्ग पति-पत्नी से हुई। उन्होंने बताया कि वे पहली बार अधिवेशन में आएँ हैं। पायनियर सेवा कर रहे पति-पत्नी ने उनसे पूछा, “आपको यहाँ आने का न्यौता किसने दिया?” उन्होंने जवाब दिया, “एक दिन जब हम घर लौटे, तो न्यौता का परचा दरवाजे के नीचे रखा हुआ था।” उन्होंने वह परचा पढ़ा और पीछे दिया कूपन भी भरा। अधिवेशन में आए कुछ भाई-बहनों ने उस बुज़ुर्ग जोड़े के साथ खाना खाया। उन्हें कार्यक्रम इतना पसंद आया कि उन्होंने तय किया कि वे अगले दिन के कार्यक्रम में भी आएँगे। उनसे दोबारा मिलने और उनकी दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इंतज़ाम किए गए।

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